- विश्व रक्तदाता दिवस पर केयर सीएचएल हॉस्पिटल में हुआ रक्तदान शिविर
- नाबार्ड के सहयोग से मध्यप्रदेश के चार विशिष्ट उत्पादों को जीआई टैग प्राप्त
- जैपुरिया इंदौर का 14वां दीक्षांत समारोह सम्पन्न; वर्ष 2026 का बैच दुनिया का नेतृत्व करने को तैयार
- Jaipuria Indore Celebrates 14th Convocation; Batch of 2026 Set to Lead the World
- Welcome To The Jungle Trailer Trends #1 Across Languages on YouTube, Film Clinches No.1 Spot on IMDb’s List of TOP 10 Most-Anticipated Indian Films
भारतीय फोर्जिंग उद्योग संघ (AIFI) ने स्टील की क़ीमतों में भारी वृद्धि की समस्या को माननीय प्रधानमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी के समक्ष प्रस्तुत किया
संघ ने इसी तरह सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय, भारी उद्योग मंत्रालय, इस्पात मंत्रालय तथा वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय को भी पत्र लिखा है
जुलाई, 2021: कोरोना वायरस की वजह से पैदा हुए संकट ने मोटर वाहन उद्योग के साथ-साथ मोटर वाहन के कलपुर्जों के निर्माताओं तथा फोर्जिंग उद्योगों को बुरी तरह प्रभावित किया है। उद्योग जगत धीरे-धीरे महामारी की दूसरी लहर से उबर रहा है, लेकिन स्टील की क़ीमतों में तेजी से बढ़ोतरी होने की वजह से भारत के फोर्जिंग उद्योग पर बुरा असर पड़ा है। भारतीय फोर्जिंग उद्योग संघ (AIFI) ने भारत के माननीय प्रधानमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर भारतीय इस्पात उद्योग द्वारा स्टील की क़ीमतों में वृद्धि पर चिंता व्यक्त की है। भारतीय फोर्जिंग उद्योग और मोटर वाहन के कलपुर्जों के निर्माताओं को एक बड़े संकट से बचाने के लिए, संघ की ओर से स्टील की क़ीमतों में वृद्धि पर तत्काल हस्तक्षेप करने और इसे वापस लेने का अनुरोध किया गया है।
भारत में MSME क्षेत्र का 85% हिस्सा फोर्जिंग उद्योग में शामिल है। 3 लाख से ज्यादा लोग प्रत्यक्ष रूप से इस उद्योग में कार्यरत हैं, जबकि अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार पाने वाले लोगों की संख्या भी लगभग इतनी ही है। भारतीय फोर्जिंग उद्योग चीन के बाद दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा उद्योग है। EEPC ने फोर्जिंग उद्योग जगत को निर्यात में वृद्धि के प्रमुख क्षेत्रों में से एक के रूप में चिह्नित किया है। भारतीय फोर्जिंग उद्योग हमेशा से भारतीय विनिर्माण क्षेत्र की प्रगति का वाहक रहा है, साथ ही यह देश के मोटर वाहन, बिजली एवं सामान्य इंजीनियरिंग क्षेत्रों की सफलता को सक्षम बनाने एवं बरकरार रखने वाले महत्वपूर्ण उद्योगों में से एक है। इस उद्योग जगत ने ‘मेक इन इंडिया’ पहल में महत्वपूर्ण योगदानकर्ता बनकर रक्षा मंत्रालय के तहत OFM की आवश्यकताओं को पूरा कर रहा है।
इस मौके पर AIFI के अध्यक्ष, श्री विकास बजाज ने कहा, “कोविड-19 महामारी से बुरी तरह प्रभावित होने के बाद, घरेलू स्तर पर मोटर वाहन उद्योग की ओर से मांग बढ़ने के साथ-साथ निर्यात के अनुकूल अवसर के कारण फोर्जिंग उद्योग धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लौट रहा है। चीन के मौजूदा हालात की वजह से, वर्तमान में उत्तरी अमेरिका और यूरोप दोनों क्षेत्रों से नए ग्राहकों द्वारा की जाने वाली पूछताछ की संख्या में वृद्धि हो रही है। स्टील की कीमतों में वृद्धि का उपभोक्ता मुद्रास्फीति सूचकांक (CII) पर बुरा असर पड़ने की बात सामने आई है। अगर सरकार स्टील की कीमतों में इस असंगत और अनुचित वृद्धि को रोकने के लिए जल्द-से-जल्द हस्तक्षेप नहीं करती है, तो उस स्थिति में भारत का पूरा ऑटोमोबाइल, ऑटो कंपोनेंट और फोर्जिंग उद्योग वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाएगा।”
पिछले साल, स्टील की क़ीमत में तेजी से वृद्धि हुई और यह 16950/- रुपये प्रति टन तक पहुंच गया। इसके अलावा, इस्पात उद्योग ने अब जुलाई 2021 से इसमें 6000/- रुपये प्रति मीट्रिक टन की वृद्धि की मांग की है, जिससे कुल मिलाकर स्टील की क़ीमत 22450/- रुपये प्रति टन हो गई है। इसी अवधि में अमेरिका में स्टील की कीमतों में 175 डॉलर (12800/- रुपये) की वृद्धि हुई, जबकि यूरोप में स्टील की कीमतों में 150 यूरो (12900/- रुपये) की वृद्धि हुई।
उन्होंने आगे कहा, “वर्तमान में, उद्योग जगत अभी भी बेहद मुश्किल दौर से गुजर रहा है और घाटे का वहन करने में असमर्थ है। हमने माननीय प्रधानमंत्री महोदय को पत्र लिखकर इस मामले में उनके हस्तक्षेप का अनुरोध किया है, और मांग की है कि भारतीय इस्पात उद्योग द्वारा स्टील की क़ीमतों में अनुचित वृद्धि को तुरंत वापस लिया जाए। हम सरकार से सकारात्मक प्रतिक्रिया और कार्रवाई की उम्मीद कर रहे हैं।”
मार्च 2020 में AIFI द्वारा किए गए सबसे नवीनतम द्विवार्षिक सर्वेक्षण के आधार पर, भारतीय फोर्जिंग उद्योग का अनुमानित कारोबार 40,000 करोड़ रुपये का है, जिसमें से निर्यात का योगदान 14000 करोड़ रुपये है। वित्त-वर्ष 2021-22 के लिए, 2021 और 2024 के बीच भारत में फोर्जिंग उत्पादन में 10% से अधिक की CAGR से वृद्धि का अनुमान है।
श्री यश जिनेन्द्र मुनोत, उपाध्यक्ष, AIFI ने कहा, “फोर्जिंग उद्योग में सबसे प्रमुख कच्चे माल के तौर पर स्टील का इस्तेमाल किया जाता है, और फोर्जिंग के एक्स-फैक्ट्री मूल्य में इसकी हिस्सेदारी 60 से 65 प्रतिशत है। अनुमान है कि, क़ीमतों में वृद्धि के साथ यह प्रतिशत बढ़कर लगभग 75 प्रतिशत हो जाएगा। कच्चे माल की लागत के प्रतिशत में इतनी बढ़ोतरी से इस उद्योग का अस्तित्व संकट में आ गया है। पिछले छह महीनों के दौरान स्टील की क़ीमतों में 25 से 30% की वृद्धि हुई है, जिससे फोर्जिंग उद्योग पर संकट गहरा गया है, खासकर जब हम कोविड-19 की वजह से कारोबार को होने वाले नुकसान तथा इसके चलते नकदी प्रवाह एवं नकदी भंडार पर पड़ने वाले परिणामी प्रभाव से उबरने की कोशिश कर रहे हैं। फोर्जिंग संघ की ओर से यह प्रस्ताव दिया गया है कि सरकार को घरेलू स्तर पर स्टील की क़ीमतों को विनियमित करने पर विचार करना चाहिए।
कार्टेलाइज़ेशन और लॉजिस्टिक्स की लागत में वृद्धि: हालांकि फोर्जिंग उद्योग में बड़े पैमाने पर विस्तार तथा रोजगार के अतिरिक्त अवसर उत्पन्न करने की पर्याप्त क्षमता है, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय क़ीमतों की तुलना में घरेलू स्टील की क़ीमतों में वृद्धि एक बड़ी चिंता का विषय है। आंकड़ों से स्पष्ट तौर पर पता चलता है कि इस्पात उद्योग की कीमतों में बढ़ोतरी पूरी तरह से अनुचित है। इसके अलावा, देश भर में स्टील मिलों से मूल्य वृद्धि के संदर्भ में उनकी मांग उनके बीच गुटबंदी को दर्शाती है, और मांग पत्र में इस बात को वैसे ही वर्णित किया गया है।
वर्तमान में, भारत के सभी फोर्जिंग निर्यातकों ने अपने-अपने ग्राहकों के साथ दीर्घकालिक अनुबंध किए हैं, और सामग्रियों की क़ीमतों में वृद्धि के लिए क्षतिपूर्ति मुख्य रूप से अमेरिकन मेटल्स मार्केट (AMM) और यूरो फोर्ज जैसे अंतर्राष्ट्रीय मूल्य सूचकांकों पर आधारित हैं। भारतीय स्टील की क़ीमतों में असंगत रूप से वृद्धि के कारण दुनिया भर के ग्राहकों द्वारा 3500/- रुपये प्रति टन के अंतर का भुगतान नहीं किया। इसके चलते, फोर्जिंग उद्योग को अपनी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को पूरा करने के लिए नुक़सान उठाना पड़ रहा है। इसके अलावा, लॉजिस्टिक्स की लागत में भी काफी वृद्धि हुई है, जो लगभग दोगुनी हो गई है। नतीजतन, इस क्षेत्र के कई MSMEs अपना कारोबार बंद करने के लिए विवश हो चुके हैं।


